Saturday, 30 September 2017

प्रदयमन ठाकुर, माँ मैं डरा नहीं

माँ, मै डरा नहीं
था मै बहादुर बेटा
इस बार रोया भी नहीं

मेरे हर आंसू पे तूने संभाला
कहा के बहादुर बच्चे रोते नहीं
देख लो ना, मै रोया नहीं


मै खुद ही खुद को संभालता रहा
रेंगते हुए जिंदगी की और दौड़ता रहा
लेकिन ये रेस मै हार गया

मैं  खून से लहूलुहान था जमीन पर पड़ा
लेकिन तूने कहा था रोना नहीं
देख लो, माँ मै रोया नहीं

Saturday, 16 September 2017

देश का सबसे संवेदनहीन प्रधानमंत्री

"सौगंध मुझे इस मिटटी की,
मै देश नहीं बिकने दूंगा"

" अच्छे दिन आने वाले है"

मोदी जी, आप वो प्रधानमंत्री है, जिसे इस देश की जनता ने  प्यार और गौरव इ साथ देश की कुर्सी पर बिठाया।
आप वो प्रधानमंत्री है जो पिछलेदो दशकों केबाद पहली बार सम्पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता मैं आये।
आप वो प्रधान मंत्री है जिसे देश के लोगो ने आम जनता का प्रधानमंत्री माना था।
आप वो प्रधान मंत्री यही जो 90 दिनों मई देश का काला धन देश मै  लाने वाले थे।

पर  मुझे बेहद्द अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है के आप इस देश के सब से सवेंदन हीन  साबित हुए।
देश मै बिहार झारखण्ड जहा नक्सलवाद पूरी तरह से आतंकवाद का रूप ले चूका है आप उस देश के प्रधान मंत्री है।
हरियाणा प्रदेश मै जाट आरक्षण के नाम पर सेकड़ो महिलाओं से बलात्कार हो जाता है और  बलात्कारी के लिए  की जान चली जाती है परन्तु उसके बाद भी प्रदेश की जनता के लिए एक सहानुभूति भरा शब्द नहीं निकल पता आपके मुँह से।

गुरग्राम मै  के बच्चे की स्कूल के भीतर दिन डिहरे हत्या हो जाती है। पुरे देश के माता पिता चाहे वो कोई आम जनता थी या कोई अभिनेता अपने बच्चो की सुरक्षा के लिए भयभीत हो जाते है। परन्तु आप उस वक्त अहमदाबाद शहर को दुल्हन की तरह सजा रहे थे अपने जापानी दोस्त के लिए।

 देश की ट्रैन का जहा बुरा हाल है , शायद ही कोई ट्रैन पूरी तरह से समय बढ़ता के साथ चलती हो।  4 महीने बाद की एडवांस बुकिंग की डेट भी जहा कन्फर्म नहीं हो पाती वहा बुलेट ट्रैन की निजी खवाइश के लिए देश का पैसा बर्बाद किया जा रहा है

एक 12th पास महिला को देश की शिक्षा मंत्री बनाया जा रहा है।  वह भी उस महिला को जिसे राजनीती का कोई तजरुबा नहीं और जो न कही से संसद है न  प्रतिनिधि।

मोदी जी आप को लालू प्रसाद की बेटी  जाने की फुर्सत तो है , सुरेश रैना जो की एक क्रिकेटर है उसकी शादी मै  भी जाने की फुर्सत है परन्तु क्या आपको दंगा प्रभावित क्षेत्र मई जाना जरुरी नहीं लगा ? पंचकूला , मुजाफर नगर, सहारनपुर क्या जहा लोगो ने अपनी जान साम्प्रदायिकता मै गवा दी क्या वहा आपका जाना जरुरी नहीं था।
देश की बेटिया पहले से अधिक असुरक्षित है , रेलगाड़ी का खाना  150 रुपये मई भी घटिया से घिटया होता जा रा है , टूटी हुयी सड़को की वजह से रोज सेकड़ो हादसे हो जाते है।  धर्मगुरु जो 700 एकड़ से 1200 एकड़ मै खुलेआम अपनी अयाशी की अड्डे चला रहे है
मै  जानना चाहती हु की इतनी बड़ी जगह इन ट्रस्टों के नाम कर दी जाती है और उस जगह पर कोई भी सरकारी पुलिस स्टेशन नहीं।  सरकार  को इतना भरोसा क्यों है इन डेरो पर ? क्युकी यह एक सस्ता और आसान वोट बैंक है।
मै जानती हु के आपके पास कोई जवाब नहीं होगा और न  सवालो  जवाब देंगे हलाकि जनता के सेवक होने के नाते ये आपकी जिम्मेदारी है के आप मेरे सवालों का जवाब दे  मै  फिर भी आपसे ये सवाल करती रहूंगी क्युकी ये मेरा फर्ज और हक़ है चाहे आप आप इन सवालों का जवाब न देकर अपना फर्ज भूल जाए लेकिन मई अपना फर्ज नहीं भूलूंगी। 

Friday, 15 September 2017

प्रदयमन ठाकुर, माँ मैं डरा नहीं

माँ, मै डरा नहीं
था मै बहादुर बेटा
इस बार रोया भी नहीं

मेरे हर आंसू पे तूने संभाला
कहा के बहादुर बच्चे रोते नहीं
देख लो ना, मै रोया नहीं


मै खुद ही खुद को संभालता रहा
रेंगते हुए जिंदगी की और दौड़ता रहा
लेकिन ये रेस मै हार गया

मई खून से लहूलुहान था जमीन पर पड़ा
लेकिन तूने कहा था रोना नहीं
देख लो, माँ मै रोया नहीं


प्रद्युमन ठाकुर , माँ मै कितना तड़पा

माँ मैं  कितना तड़पा ,
माँ ये कैसा दर्द था

आज मेरा इम्तिहान था
मेरी टीचर ने क्या मुझे डांटा
माँ , मैं इम्तिहान नहीं दे पाया
माँ ये आदम  था या आदमखोर का साया
माँ मैं कितना तड़पा
माँ तू थी उस वक़्त कहा

मेरे बैग किताब पे ये कैसा दाग था
ये लाल रंग कहा से आया
ये कपड़ो पे लहू कहा से आया
ये सांसो पे खून कैसे आया
माँ मैं कितना तड़पा ,
माँ तू थी क्यों न वहा

मुझे जब जब चोट लगी
तू हर वक्त , हर इंसान से लड़ी
जरा सा खून बी बहा तो
जाने कितना दर्द तुझको हुआ
माँ  मैं कितना तड़पा
माँ, अब मई हु सुकून से यहाँ

मैं अब तक ना समझा के हुआ क्या गुनाह
राक्षशी कहानियो  में कैसे जीत जाता था सच यहाँ
मेरे खून के कतरो से कैसी थी दुश्मनी उसको
क्यों हर कटरा दिया उसने पानी की तरह बहा
माँ, मै  कितना तड़पा
माँ, तूने लगाई देर इतनी कहाँ

मेरी एक चॉकेलट पड़ी है अभी तक
जो मैंने बहन को भी न खाने दी
कल जो था बर्थडे किसी का
माँ मेरा भी जनम दिन तुम मानना इस बार
माँ, मैं  कितना तड़पा
माँ, तेरा आँचल है कहा

मुझे दर्द  भी हुआ, सास भी रुकी
पर  मैडम और लोग क्यों रहे थे चिल्ला
मैं बोलना चाहता था उड़ना चाहता था
पर क्यों बेसुध होकर फिर जमीन पर गिर पड़ा
माँ, मै कितना तड़पा
माँ, आज आई चैन की नींद यहाँ


maan main kitana tadapa ,
maan ye kaisa dard tha 

aaj mera imtihaan tha 
meree teechar ne kya mujhe daanta 
maan , main imtihaan nahin de paaya 
maan ye aadam tha ya aadamakhor ka saaya 
maan main kitana tadapa 
maan too thee us vaqt kaha 

mere baig kitaab pe ye kaisa daag tha 
ye laal rang kaha se aaya 
ye kapado pe lahoo kaha se aaya 
ye saanso pe khoon kaise aaya 
maan main kitana tadapa ,
maan too thee kyon na vaha 

mujhe jab jab chot lagee 
too har vakt , har insaan se ladee 
jara sa khoon bee baha to 
jaane kitana dard tujhako hua 
maan main kitana tadapa 
maan, ab maee hu sukoon se yahaan 

main ab tak na samajha ke hua kya gunaah 
raakshashee kahaaniyo mein kaise jeet jaata tha sach yahaan 
mere khoon ke kataro se kaisee thee dushmanee usako 
kyon har katara diya usane paanee kee tarah baha 
maan, mai kitana tadapa 
maan, toone lagaee der itanee kahaan 

meree ek chokelat padee hai abhee tak 
jo mainne bahan ko bhee na khaane dee 
kal jo tha barthade kisee ka 
maan mera bhee janam din tum maanana is baar 
maan, main kitana tadapa 
maan, tera aanchal hai kaha 

mujhe dard bhee hua, saas bhee rukee 
par maidam aur log kyon rahe the chilla 
main bolana chaahata tha udana chaahata tha 
par kyon besudh hokar phir jameen par gir pada 
maan, mai kitana tadapa 
maan, aaj aaee chain kee neend yahaan

Tuesday, 12 September 2017

प्रदुमन ठाकुर , ryan international school murder case

प्रदुमन ठाकुर
एक 7  साल का बच्चा, आँखों कैसी ख़ुशी ,चमक, सपने और उड़ान रखता है ये मै बहुत अच्छे  से जानती हु। क्युकी मैं भी एक माँ  हु 6 साल के बच्चे की।  टीवी पर जब ये खबर सुनी के गुड़गांव के रयान इंटरनेशनल स्कूल मैं एक 7  साल के बच्चे का मर्डर हो गया उस वक्त मै दूसरे कमरे में बैठी आराम कर रही थी। पिछले कुछ दिनों से बुखार की वजह से बहुत कमजोरी महसूस हो रही थी तो अपने कमरे मै लेटी मैं आराम कर रही थी।  टाइम दोपहर के 12 बजे होंगे। पापा ने न्यूज़ चैनल लगाया और ये खबर आने लगी।
मैंने अचानक से डरने लगी। मेरा बेटा स्कूल से आने वाला था।  जैसे ही स्कूल से आया उसे मैंने बहुत प्यार किया और सोचा के ये खबर 2 -4  दिन मैं टीवी से ख़तम हो जाएगी और मेरे दिले दीमाग से भी उतर जायेगी। जैसे बाकी की सब खबरे न्यूज़ चैनेलो से आकर धीरे धीरे गायब हो जाती है।
पर ऐसा हुआ नहीं ,बार बार टीवी पर उस बच्चे  की तस्वीरें देखती हु और सोचती हु के गर इंसान को रहम नहीं आया तो कुदरत को भी रहम नहीं आया उस मासूम चेहरे पर।
एक माँ कितनी राते जागती रही , कितने ख्वाब रही के ये बच्चा होकर कैसा लगेगा। उसके लिए दिन रात दुवाये मांगती रही होगी।  उसे जब जब भी जरा सा चोट लगी होगी तो माँ 10 बार आह  भरी होगी।  जरा से बुखार खांसी पे उसे गोद से नीचे नहीं उतरने देती होगी और आज उसका बच्चा कौन से लथपथ जमीन पर गिरा पड़ा था बेजान सा शरीर से जान बस निकलने वाली थी। बच्चे को कुछ महसूस नहीं हो रहा था बस कुछ शोर की आवाजे  और फिर कोई आया उसे गोद में उठाया और भागने लगा। आनन् फानन मै उसे कार मई लेकर हॉस्पिटल की तरफ भागे उस बेजान सी नन्ही सी जान के साथ। लेकिन बेरहम किस्मत को एक माँ की गोद सुनी कर के ही चैन आया। हॉस्पिटल मैं डॉक्टरों ने प्रद्युमन को मृत घोषित कर दिया और एक माँ की सभी दुवाओ को बेअसर और बेकार साबित कर दिया।
आज 4 दिन बीत गए लेकिन मैं अभी भी डर से बाहर नहीं ला पायी खुद को।  रोज रात को अपने बच्चे को जोर से सीने से लगाकर सोती हु दिन भर उसे लाड लगाती हु।  डर के मारे उसे दांत भी नहीं पाती।  मैंने कभी नई देखा उस बच्चे को लेकिन दिन रात बस दुवा करती हु फिर भी।  जानती हु के ये सब दुवाये बेकार है अब लेकिन मैं दवा करती हु के उस माँ को हौंसला मिले खुद को संभालने का।  उस बाप को हिम्मत रहे अपने बच्चे के कातिलों से लड़ने की।  आमीन 

Wednesday, 28 June 2017

अनार का पेड़

अपने 6 साल के बेटे को  आगे पीछे शरारते करते जब   अक्सर अपना बचपन बहुत याद आता है बड़ा सा आंगन और बहुत से पेड़ , आम के, जामुन के और अमरुद के , और भी  जाने कितने तरह  पेड़  थे।  मैं कसर जमीन पे उगने वाले पढ़िए के पत्ते तुलसी के पत्ते तोड़ के खाया करती थी 
मुझे याद है के हम  जिस  घर एक एक  दुरी पे थे और बहुत बड़े भी।  हमारे घर के पीछे भी छोटे छोटे कमरे मई लगभग 6 या उस से ज्यादा परिवार रहते थे। तक़रीबन सभी परिवार बिहार के पिछड़े इलाको से थे और रहन सहन बहुत ख़राब था।  उनके बचो के कपडे अक्सर मैले और कई बार बदबूदार भी होते थे। पर मैं बहुत खुश रहती थी उन बचो के साथ।  स्कूल से आते ही उन बचो के साथ घर घर  खेलना मेरा  खेल था। हलाकि ज्यादातर खेल वो बचे सड़क के किनारे खेलते थे जिस से मेरी माँ को  था।  क्युकी ये उनके मुताबिक अचे बच्चो का काम नहीं।  शायद वो सही भी हो उस वक्त अपनी सोच मैं क्युकी हमारे आंगन मैं इतनी जगह थी के आराम से खेला जा सकता था और ऐसे मैं मेरी माँ को मेरा घर से दूर सड़क के बीच ख़राब हालात बचो के साथ खेलना उन्हें निश्चित ही परेशान भी करता होगा। मुझे आज भी याद है उन बचो के नाम , दीपमाला , शोभा, नैना, आरती , राजू, मुनिया ,मीशा, मनसा, मनभावती  और चुहिया। 
बिहार के गांव से होने के कारन उन लोगो को खेती बाड़ी की बेहतर अछि समझ भी थी इसीलिए  मैं अक्सर आंगन मैं पेड़ पौधे लगाती थी कभी टमाटर , कभी  भिंडी तो कभी घीया ,टोरी , मक्की ,पुदीना  और पपीता। हलाकि ये ज्यादातर पेड़ मौसम के करवट बदलते ही खराब होकर सूख  जाते थे 
मुझे याद है के मेरी माँ ने मुझे एक अनार का पौधा लाकर दिया था जिसे अपने स्टोर रूम के  पीछे मैंने रोप दिया था और रोज उसे खूब प्यार से मैं  पानी देती थी उसके लिए खाद का इंतजाम करना और कीट नाशक छिड़कना ये सब  जरुरी काम थे 
 समय के  उस पेड़ की लम्बाई बड़ी और वो पेड़ मेरे कमर से भी ऊँचा हो गया और एक साल मैं वो पेड़ मेरे सर से भी ऊँचा हो गया 
 और 2 साल बाद उस पर फूल  उगने लगे और मैं  अभी भी दीपमाला और चुहिया के साथ उस पेड़ के निचे स्टापू खेला करती थी पहले साल 4 अनार लगे और  अगले  बरस शयद 20 अनार लगे फिर एक दिन उस घर को  मेरे माँ पापा ने किसी को बेच दिया और हमें 6  महीने मैं वो घर खाली करना था मई सोचती रही के कैसे उस पेड़ को साथ सकू और धीरे धीरे सभी किरायेदारों ने वो घर छोड़ दिया वो पेड़ वीरान सा बना वही खड़ा रहा। अब मई भी उस पेड़ के पास नहीं जाती थी क्युकी दीपमाला , शोभा, चुहिया कोई भी तो नहीं था मेरे साथ।  तो किसके साथ खेलती स्टापू और अकेले तो उस  के फल गिनने का भी दिल नहीं करता था।  ऐसा लगता था के वो पेड़  चूका था के अब उसे अकेले ही रहन होगा इसीलिए उसके पत्ते न तो अब हिलते थे न हवा करते थे ऐसा लगता था के वो पेड़  समय  से पहले  ही बूढ़ा हो चूका   था। 
धीरे धीरे हमारे  नए घर मैं  तैयारियां तेज हो गई सब लोग नए घर की साज सजावट और सफाई मैं  व्यस्त हो गए और आखिर वो दिन आ ही गया  जब हमें  वो घर छोर कर जाना था।  एक एक करके सब  समान नए घर मैं ट्रक ट्रक से पहुंचाया जाएं लगा और सबसे आखिर मई सब पेड़ पोधो को गमलो को ट्रक मै  रखा गया।  पर पेड़ वो पेड़ वही खड़ा रहा और हम उस घर की चाबी किसी और के हवाले कर के नए घर  को आ गए।   

अब  भी सोचती हु  वो पेड़ इंसानो की तरह क्यों नहीं था ? क्यू  जड़े छोड़ नहीं सकता था ?

रेलवे स्टेशन का साधू

रेलवे स्टेशन के खाली प्लेटफार्म पर बैठी, मैं ट्रैन का इन्तजार कर रही थी. लाउड स्पीकर से आने वाली हर आवाज को मेरे कान लगातार सुन रहे थे. मेरी ट्रैन निकल चुकी थी और अगली ट्रैन २ घंटे बाद थी. मैं  एक अच्छी लड़की की तरह चुपचाप प्लॅटफॉर पे बैठी हुई थी।  आने जाने वाले लोगो की हलचल देख रही थी. कुछ लोग अपने बच्चो को चिप्स के पैकेट खरीद के दे रहे थे. और कुछ बेवजह ही प्लेटफार्म से दूर तक रेलट्रैक को देख रहे थे के शायद कोई और ट्रैन हो जिस से वो जल्दी पहुंच सके अपनी मंजिल को। 
प्लेटफार्म पे लगी सीमेंट की बैठने की कुर्सी पर बैठे हर किसी इंसान को इन्तजार था अगली  ट्रैन का।  इतने  मैं एक साधू भी प्लेटफार्म पे आया।  उम्र से काफी कम दिखें वाला वो साधू बाबा पूरी फुर्ती के साथ स्टेशन   पे इधर से उधर चहलकदमी करने लगा. कपड़ो की बात करू  तो बसंती रंग का कुरता और धोती पहने हुआ था वो बाबा।  शरीर की लम्बाई भी 6  फुट के आस पास होगी।  बालो की लम्बी जटाये सर पे लपेट कर और उसपर भी बसंती रंग की पगड़ी पहन कर वो चहलकदमी करे जा रहा था।  
इतने मैं एक शताब्दी ट्रैन आई पर उस ट्रैन पे केवल रिजर्वेशन यानी के वो लोग जो अधिक किराया दे सकते थे वह लोग ही जा सकते थे।  कुछ सावरीया ट्रैन से उत्तरी और शायद दो चार लोग उसमें चढ़े और ट्रैन चल पड़ी।  दो मिनट मै  ही पलटफोर्म फिर से वीरान हो गया।  
तभी वो साधू बाबा उठा और एक पुरुष  के पास जाकर बोला  " कुछ खिला दो बाबा, मुझे भूख लगी है " उस आदमी ने पेण्ट शर्ट पहनी हुई तो अछि हैसियत का मालूम होता था। पर फिर भी उस आदमी उसे गर्दन हिलाकर मना कर दिया। 
फिर वह साधू बाबा एक और आदमी के पास गया और वही बात बोली, पर उसे इस बार भी इस तरह मना कर दिया गया इसके बाद एक बार और ये ही हुआ और इस बार उस साधू बाबा के सहनशक्ति जवाब दे गयी।  और उसने अपने सर से पगड़ी उठा कर प्लेटफार्म पे फेक दी और गाली देकर चिल्लाते हुए बोला " क्या तुम्हे केवल वो ही लोग साधू सन्यासी नजर आटे है जो भगवा कपडे पहन कर ए सी गाड़ीमे इधर उधर घूमते रहते है, और तुम लोग भी उनके आगे हाथ जोड़े खड़े रहते हो और नोटों की गद्दी लेकर भी। उन लोगो के तुम पेअर छूने को भी तैयार रहते हो लेकिन मैं क्या साधू नहीं।  ये जटाये  क्या मैंने यु ही शोक मैं  बड़ा ली। "

इतना कहकर उस साधू बाबा ने अपनी कमर से निचे गिरती जटाये  फिर से लपेटी और जमीन से गिरी हुई भगवा पगड़ी उठाई और दुबारा सर पर लपेट ली और प्लेटफार्म के कोने से तेजी से आगे चला गया 
परन्तु उसकी बाते अभी भी मेरे मैं को भीतर तक कचोटती है के आज के जीवन मैं लोग ए सी कमरे मैं रहने वाले, सोने चांदी के बर्तन मई खाने वाले और अचे संस्कारो का भाषण देने वाले को ही साधू क्यों मानते है कुछ लोग तर्क डेट है ये सड़क पे घूमें वाले साधू पीसो का उपयोग नशे का सेवन के लिट्ये करते है परन्तु इस बात का क्या प्रमाण के 5 स्टार साधू जो लम्बी लम्बी गाड़ियों ै घुटे है के वो यह सब प्रकार के विकारो से दूर है ?

इतने मैं ही मेरी ट्रैन आ गयी और मैं भी बाकी सभी लोगो की तरह ट्रैन मैं बैठ निकल पड़ी मंजिल की और। 





प्रदयमन ठाकुर, माँ मैं डरा नहीं

माँ, मै डरा नहीं था मै बहादुर बेटा इस बार रोया भी नहीं मेरे हर आंसू पे तूने संभाला कहा के बहादुर बच्चे रोते नहीं देख लो ना, मै रोया ...