Dikhava

'दिखावा' एक लघु कहानी ब्लॉग है। यह एक प्रयास है समाज को आइना दिखाने का। ' दिखावा ' मुख्या उदेशय लोगो को अंतकरण मै झाकने के लिए प्रेरित करना है

Tuesday, 4 December 2018

मोक्ष अभिलाषी moksh abhilashi

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वो एक मोक्ष अभिलाषी था। उसे इर्द गिर्द अच्छे सच्चे और नेक कर्मो का घेरा था।
उसे बच्चो से प्यार था। उसे पेड़ पोधे हरियाली उगाने का शोक था।
वो मोम दिल था। वो आंसू देख नहीं सकता था। वो अपनी बेटियो को शहजादियों की तरह रखता था।
एक बार उसे गलती से झुंझलाहट में मैंने कुछ कह दिया तो गुस्से में मुझे बोल गया के उसकी बेटियो की ख़ुशी के लिए उसके अच्छे कर्म ही काफी है।
वो तीर्थ दर्शन करना चाहता था। वो गंगा किनारे मेरे संग बैठा रहता था।
वो गली गली मुझे ढूंढता रहता था।
वो जीवन सीमा के बाद भी मेरे संग रहने की उम्मीद करता था। उसे मेरा कोई भी लहजा चाहे  नरम या सख्त कभी बुरा नहीं लगता था।
सच कहु तो मुझे भी वो फरिश्ता सा ही लगता था।
मगर ये सब बातो में अब 'था' आता है क्योंकि वो है लेकिन वो ये सब नहीं है अब
वो गुनाहो की कोठरी में बंद है अब,
उसके सब अच्छे कर्म मेरे पर आकर खाक हो गए।
वो जो मोम बना फिरता था मेरे सामने पत्थर बन गया अब।
वो जो आंसुओ को भी बर्दाश्त नहीं कर सकता था वो मेरी मिन्नतों को भी नजर अंदाज कर के जा चूका है। उसके सर मुझे जीते जी मारने का इल्जाम आ चूका है।
वो जो मेरे सर पर चादर बनकर ढका करता था दामन मेरा, वो दुनिया भर के महफ़िल में रुसवा कर चूका मुझे।
वो जो गलियो गलियो ढूंडा करता था मुझे , आज अंधे कुवें में धकेल चूका मुझे।

उसे इतना ही कहना चाहती हु के अब उसके अच्छे कर्म खत्म हो गए केवल नीच कर्म ही बाकी है।
और उनका हिसाब दिए बिना दुनिया से उसे जाने नहीं दूंगी मैं।
जो किसी की बेटी को लाश बनाकर भरे बाजार फेक गया , एक दिन खुदा उसकी बेटियो को भी ये अंजाम देगा।
क्योंकि मैंने सुना के खुदा की अदालत में आँख के बदले आँख, और इज्जत के बदले इज्जत देकर हिसाब चुकाया जाता है।

मै खुदा नहीं मगर ये यकीन जरूर है मुझे के मेरी बददुआ उसे अगले 100 जन्मो तक भी मोक्ष नहीं देने देंगी। अब उस मोक्ष अभिलाषी को माफ़ी नहीं मिलेगी

Monday, 3 December 2018

जायज बददुआ

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स्वाति रिक्शा के पीछे बैठी भीड़ भाड़ वाले बाज़ारो से निकल रही थी। बाजारों में यु तो वैसी ही रौनक और शोर गुल था जैसा की हर बार दीवाली पे होती है। मगर ये सब कुछ स्वाति को अच्छा नहीं लग रहा था । वो जाने किन सोचो में गुम थी।
सात साल पहले
स्वाति बहुत उदास और परेशान थी। उसकी शादी को दो साल भी नहीं हुए थे के हालात तालाक तक पहुँच गए थे। कोर्ट में केस चल पड़ा था। दोनों पार्टीज जानती थी के होगा कुछ नहीं आखिर में तलाक ही होगी बस लेकिन  सब कोर्ट   कचहरी के रिवायती दस्तूर थे तो आगे बढ़ रहे थे।
इस परेशानी में स्वाति को कुछ समझ नहीं आ रहा था के क्या करे, किस से बात करे, कोई भी उसे अपना लग नहीं रहा था और सहेलियों की तो पहले ही शादी हो गई थी । स्वाति बहित अकेली हो गई थी ।वो भूल जाना चाहती थी के उसकी कभी शादी भी हुई थी।
यु ही एक दिन उसकी मुलाकात राजेश से हुई। राजेश यु पी जल बोर्ड, मेरठ मे सरकारी नोकरी करता था।
बातो बातो में बात होने लगी। दरसअल राजेश कानूनी मसलो में काफी अछि जानकारी रखता था। तो कई बार स्वाति उस से सलाह लेने क लिए उस से बात कर लेती थी।
इसी बीच राजेश ने उसे बताया के वो शादीशुदा है और दो बेटियो का बाप भी है।
स्वाति को  इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि वो इसे महज दोस्त की नजर से देखती थी और वैसे भी स्वाति भी अभी कुछ महीने पहले एक बेटे की माँ बन चुकी थी ।
राजेश ने उसे बताया के उसके और उसकी पत्नी अपर्णा के सम्बन्ध अच्छे नहीं थे ।वो केवल अपनी पत्नी और बच्चों की जिमेदारी निभा रहा है वर्ना उसके घरवालो को न तो राजेश की कोई जरुरत थी और न ही कोई प्यार।
स्वाति को उसकी बातो से बहुत सहानुभूति होने लगी लेकिन इस सहानुभूति का मतलब राजेश ने प्यार समझ लिया खुद से ही।
एक दिन राजेश ने स्वाति को प्रोपोज़ कर दिया के वो  उस से शादी करना चाहता है।
इस बात से स्वाति राजी नहीं थी उसने कई बार राजेश से बात तक करना छोड़ दिया। उसे साफ़ साफ़ मना किया। मगर राजेश का मन उसके काबू में नहीं था । वो रोज किसी नये नंबर से फ़ोन करता स्वाति को, उसे sms करता, ईमेल करता, के किसी तरह स्वाति की आवाज सुन पाये।
रोज हजारो वादे करता, कस्मे खाता के वो स्वाति से केवल नाम की शादी नहीं करेगा बल्कि स्वाति को  उसका हक़ भी दिलवाएगा।
आखिर स्वाति का दिल पिघला और उसने राजेश से चोरी छिपे वृन्दावन के एक मंदिर में शादी कर ली।
इसके बाद दोनों होटल में मिलते और दो दिन दिन पति पत्नी की तरह साथ रहते और फिर अपने अपने शहर निकल जाते। हालांकि इस बीच राजेश का वादों और कसमो का सिलसिला जारी रहा। वो हजारो मर्तबा तो अपनी बेटियो की कसम खा चूका था के कुछ भी होगा लेकिन स्वाति का साथ नहीं छोड़ेगा।

अब 5 साल हो गए । स्वाति खुद के रिश्ते को दुनिया के सामने लाना चाहती थी लेकिन राजेश अभी भी अपनी परेशानियो में उलझ हुआ था। हां गर स्वाति कभी उसे भूले से भी बोल दे के वो इस गुमनाम रिश्ते में नहीं रहना चाहती तो फिर एक नयी कसम खाकर उसे कुछ दिन इन्तजार करने को बोल देता था।
एक बार स्वाति ने राजेश को बोला के उन्हें अलग हो जाना चाहिए तो राजेश ने स्वाति से कसम उठाने को बोला के वादा करो स्वाति, तुम मर जाओगी लेकिन मुझसे दूर नहीं जाओगी।
ये सब चल रहा था के अचानक खबर आई के राजेश की छोटी बेटी को कैंसर है। तो राजेश ने स्वाति से फिर से एक साल का वक़्त माँगा के इस बीच वो अपनी बेटी का इलाज कराएग और जैसे ही मन्नू यानि राजेश की छोटी बेटी ठीक होगी वो स्वाति को अपने घर यानी स्वाति को उसके ससुराल ले जायेगा और सब से परिचय करायेगा और उसे बीवी होने का हक़ भी दिलाएगा।
स्वाति को अच्छे से याद है ये भी एक वादा था राजेश का।

अब स्वाति दिल से दुआ करती थी के मन्नू ठीक हो जाए । और राजेश की जिंदगी में अब कोई परेशानी न रहे।

1 साल बीत गया, मन्नू ठीक हो गई थी। लेकिन अब राजेश का रवैया बहुत बदल चूका था । वो न तो स्वाति को खुद फ़ोन करता था न उसके फ़ोन पर ज्यादा बात करता था।
यहाँ तक के उस से मिलने को भी मना कर देता था। लेकिन स्वाति को यकीन था अभी भी के राजेश बदल नहीं सकता बस बिजी होगा तो बात नहीं करता।

एक दिन तो स्वाति ने खूब लड़ाई भी करी राजेश से, लेकिन स्वाति ने फिर सोचा के राजेश तो अपनी बेटियो के लिए जान तक देने को तौयार रहता है तो अपनी बेटियो की खायी हजारो कस्मे भूलने या तोड़ने की तो वो सोचेगा भी नहीं।

अब लड़ाई हुए एक महीना हो गया था। राजेश तो स्वाति से बात किये बिना 6 घंटे नहीं गुजार सकता था और अब एक महीने में एक फ़ोन भी नहीं।

स्वाति सोच सोचकर पागल सी हो रही थी। उसे समझ ही ना आ रहा था के क्या हो रहा है।
परेशानी बढ़ि तो शारीर पे असर दिखने लगा । स्वाति को खाना पीना पचना बंद हो गया। उसे एक महीने में दूसरी बार हॉस्पिटल एडमिट होना पड़ा।
अब स्वाति ने रोते रोते राजेश को फ़ोन किया के वो बीमार है कम से कम उसे देखने ही आ जाओ। तो राजेश ने झुँझलाकर जवाब दिया के अभी तो दो महीने टाइम नहीं उसके पास कही भी जाने आने का। तो वो नहीं आ सकता स्वाति से मिलने।उसके बाद स्वाति ने राजेश को कभी फ़ोन नहीं किया।


आज एक साल बीत गया राजेश से उस आखिरी बार फ़ोन पे बात हुए। ऐसा नहीं के स्वाति आज उसे भूल गई लेकिन हां वो अब कभी भी राजेश की आवाज नहीं सुन्ना चाहती ।

इस बीच स्वाति ने बहित बददुआ दी राजेश को और उसकी उन बेटियो को , जिनके सर की झूठी कस्मे राजेश ने खाई।
लेकिन उसने कभी भी बददुआ नहीं करी के मन्नू  को कैंसर हो दुबारा। क्योंकि उसे लगा के ये बददुआ शायद जायज न हो।

मगर आज उसे याद आयाके जब मन्नू को ये बीमारी हुआ तो राजू ने परेशानी में स्वाति को कहा के वो मन्नू को इस बीमारी में नहीं देख प् रहा। मन्नू की जगह , अपर्णा या मुझे या फिर उसकी माँ गर बीमार हो जाती तो वो उनका इलाज करा लेता लेकिन मन्नू को डॉक्टर पास ले जाने के नाम से ही डरता है वो

आज स्वाति को लगा के अब जब स्वाति सच में हॉस्पिटल एडमिट हुई तो राजू उसे देखने आना तो दूर उसका हाल भी नहीं पूछा तो इस हालात में जब वो खुद से अपनी बेटियो की कस्मे तोड़ चूका है, आज स्वाति ने फिर भरे मैं से पहली बार बददुआ करी के राजू की बेटी इस बीमारी से कभी आज़ाद ना हो।
बाकी भगवन जानेगा के सच सही गलत क्या है मगर स्वाति दिन रात के हर पहर अब उस शक्श और उसकी दोनों बेटियो के लिए लंबी उम्र की दुआ करती है के वो खूब जिए मगर तन्हाई में, उसकी बेटियो के चेहरे पर हमेशा मातम का सन्नाटा छाया रहे। राजेश आनेवाले 50 साल तक यु ही अपनी जिन्दा जागती बेटियो को लाश की तरह देखे जैसे वो स्वाति को बना गया। आमीन


Wednesday, 14 November 2018

शादी का प्रश्न और सावधानी

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अजब दस्तूर है जमाने का, आज अख़बार पढ़ रही थी तो नजर मेट्रिमोनियल कॉलम पे गयी। जब गोर से पढा तो जाना केअजीब अजीब अनजाने लोग फरमाइशें का पिटारा लेकर बैठे थे।
चलो एक अनोखी फरमाइश बताती हु जो आज भी लड़केवालों की सबसे अहम् फरमाइश रहती है। की लड़की सुन्दर होनी चाहिए । मुझे यु तो कोई ऐतराज़ नहीं के किसी की क्या फरमाइश है लेकिन आप अपनी फरमाइशें पूरा होने की सूरत क्या शादी के सफल होने के गुरंटी भी दे रहे है ये सवाल मेरा लड़केवालों से है।

दूसरी बात के आप कैसे किसी लड़की को अपने पैमाने पर खूबसूरत या बदसूरत कह सकते है। ।हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में अनेको सावंले रंग की हीरोइन है जो स्क्रीन पर आते ही सोने की तरह चमकती दिखती है। यदि आप वास्तविकता में चाहते है के आपकी पत्नी एक हेरोइन की तरह दिखे तो क्या इन हेरोइन की असलियत मालूम करना नहीं चाहिए आपको।
तीसरा प्रश्न, उपरोक्त दोनों बाते छोर दे यदि आप सुन्दर पत्नी की कामना करते है तो आपकी पत्नी भी शयद सुन्दर पति की कामना रखती होगी। तो क्या लड़के खुद को शाहरुख़ खान , सलमान खान या रणबीर सिंह जैसा आईने में देख पाते है?

चौथा प्रश्न, यदि आप को सुन्दर पत्नी भी मिल जाए तो भी उसकी सुंदरता तभी तक कायम रहेगी जब तक आप उसे किसी परी या सजावट के सामान की तरह सजा कर रखेंगे, यदि उस से घर का झाड़ू पोछा लगवाएंगे तो उसकी सुंदरता ज्यादा दिन तक कायम नहीं रहने वाली।

पांचवा प्रश्न, कितना भी सुन्दर रूप हो, उम्र के साथ खत्म ही हो जायेगा, चेहरे पर झुर्रियां भी आएँगी और बालो मे सफेदी भी , तो क्या उस सूरत में आप एक कुरूप बूढी औरत का साथ छोड़ देंगे।

यह प्रश्न तो लड़को के लिए था लेकिन सावधानी का संदेसा लड़कियो के लिए था, के उन पुरुषो से कभी शादी मत कीजिये जो आपका रूप देखकर आपसे शादी को लालायित रहते हो।


Sunday, 4 March 2018

मोदी जी की तारीफ मैं दो शब्द

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मोदी जी की तारीफ मैं दो शब्द

1.मुझे सिर्फ 50 दिन दे दो मैं आपको आपके सपनों का भारत दे दूँगा। 2.100 दिन में काला धन भारत ला दूँगा नहीं तो फाँसी दे देना। 3. 1 साल के भीतर -2 राजनीति से अपराधियों की सफाई कर दूँगा। 4. उनको 60 साल दिए हैं, मुझे सिर्फ 60 महीने दे दो। 5. 2015 तक ये कर दूँगा, 2017 तक वो कर दूँगा, नहीं तो लात मार देना, ज़िंदा जला देना। 6. 2019 तक वो भी कर दूँगा। 7. 2022 तक ही ये हो पाएगा, 2023 से पहले वो नहीं होगा। 8. 2025 तक वो हो जाएगा, 2030 से पहले ये नहीं हो सकता। 9. ये 25 साल से पहले नहीं हो सकता। वो 30 साल में ही हो पाएगा। 10. हम अगले 50 साल के लिए सत्ता में आए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अजीब सा बयान दिया कि "जो लोग दलाली नहीं ले पा रहे हैं वह रोजगार का हल्ला मचा रहे हैं" यह प्रतिवर्ष 2 करोड़ रोजगार देने के नाम पर चुन कर आए देश के प्रधानमंत्री का बयान है। यदि यह सच है तो मई 2014 से पहले नरेंद्र मोदी से अधिक रोजगार पर हल्ला मचाने वाला व्यक्ति कोई नहीं था। इस हिसाब से नरेंद्र मोदी दलाली खाने वाले सबसे बड़े व्यक्ति थे। मतलब समझिए आप, इनसे इनके किए वादों पर कोई सवाल करे तो वह पाकिस्तानी से लेकर दलाल तक इनके द्वारा ही घोषित कर दिया जाएगा। मेक इन इंडिया - फुस्स स्टार्ट अप इंडिया- फुस्स पाकिस्तान थर-थर- फुस्स चीन थर-थर - फुस्स काला धन - फुस्स 15 लाख - फुस्स 2 करोड़ रोजगार- फुस्स स्वच्छ भारत - फुस्स नमामि गंगे - फुस्स बुलेट ट्रेन - फुस्स सड़क निर्माण - फुस्स एक के बदले 10 - फुस्स महिला सुरक्षा - फुस्स विकास बाऊ - फुस्स काशी टू क्योटो - फुस्स 100 स्मार्ट सिटी - फुस्स विदेशी निवेश - फुस्स धारा 370 - फुस्स मंदिर निर्माण - फुस्स फसल का डेढ़ गुना- फुस्स वन रैंक वन पेन्शन - फुस्स लोकपाल - फुस्स मँहगाई में कमी - फुस्स व्यापार - फुस्स कहने का मतलब यह है कि सब कुछ फुस्स , और इनसे सवाल पूछो तो ये पाकिस्तानी और दलाल घोषित कर देंगे। बाकी सब ठीक है, गाय हमारी माता है बछड़ा हमारा सौतेला भाई !

Tuesday, 27 February 2018

रेड लिपस्टिक दिलवा देना

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रेखा का शादी के दो साल बाद ही तलाक हो गया था और तबसे वो अपने माता पिता के घर ही रहती थी। उसकी एक बेटी भी है जिसका जनम उसके माँ बाप के घर ही हुआ और उसके जनम के बाद वो कभी ससुराल नहीं गयी न ही कोई ससुरलिया उसकी या उसके बच्चे की खेर खबर लेने आया कभी ।और अंत मे , टूटे हुए सपनो को बटोर कर रेखा फिर से एक नयी जिंदगी जीने लगी।
वो अभी ससुराल के ख़ौफ़नाक मंजर और क्रूर पति के कैफ से बहार निकली ही नहीं थी के उसकी जिंदगी मई राजू यानी राजीव आ गया,। राजीव जराजीव जिसकी एक बीवी थी दो बेटिया थी। लेकिन जाने राजीव को क्या नजर आता था रेखा मै के वो पागलो की तरह उसे प्यार करने लगा  ।रेखा कुछ समझ नहीं पा रही थी के वो क्या करे, क्योंकि राजीव की तो गृहस्ती है और राजीव कभी बी शयद उसे पत्नी होने का पूरा सम्मान समाज मैं नहीं दिला पायेगा। इसीलिये वो राजीव से दूरी रखने लगी।लेकिन राजीव का मैं कुछ सोचने समझने को तैयार नहीं था।
गर रेखा 5 मिनट फ़ोन न थाए तो राजीव की हालात ऐसी होती थी के जैसे शारीर मई से जान निकल जाए। रेखा किसी चीज का नाम तक भी ले ले तो या किसी चीज की जरा  सी तारीफ भर भी कर दे तो राजीव तुरंत वो उसके लिए खरीद लेता tha। वो कहीं भी जाए लेकिन रेखा के लिए कुछ न कुछ जरूर लाता था। अब रेखा को भी लगने लगा क प्यार के आगे रिश्तो अ कोई मोल नही। क्या हुआ गर वो उसके साथ कभी पत्नी ककी तरह रह नहीं पाएगी लेकिन उसके दिल मै तो वो ही रहेगी और रेखा बिना ब्याह एक बंधन मै बांध गयी।
ल अब 5 साल हो गये और रेखा को कुछ अलग सा बदलाव लगने लगा राजीव दिन बा दिन उस से दूर हो रा था, उसकी हर बात को टालता था।
जो इंसान सिर्फ rekha का चेहरा 2 मिनट के लिए देखने को पहले , बिना बताये  200 किलोमीटर दूर का सफ़र तय करता था अब रेखा के बुलाने पर भी नहीं आ पा रहा था उस से मिलने। रेखा ने एक दिन कहा के मुझे लाल लिपस्टिक दिलवा दो। तो राजीव ने कहा के दिलवा दूंगा। इसके baad रेखा ने कितनी बार ही कहा होगा उस से क एक लिपस्टिक दिलवा दो लेकिन राजिव के पास हर बार नया बहाना होता था।
अब तो रोज र रेखा राजीव से लड़ने लगी के के तुम्हारे पास मेरे लिए टाइम ही नहीं लेकिन धीरे dheere तो लड़ने के लिए भी टाइम नई दे पाना मुश्किल हो गया राजीव को।

रेखा दिन रात बस रोटी रहती थी और फिर इस सदमे से उसकी सेहत भी बिगड़ने लगी । और रेखा को हॉस्पिटल एडमिट होना पड़ा लेकिन राजिव के पास अभी भी वक्त नहीं था के वो रैह को देखने जा पाये।
औरअब रेखा ने खुद को समझाना शुरू किया के वो राजीव के लिए अपनी बेटी से , माँ बाप से मुह नई मोड़ सकती।एक महीने के बाद रैह हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हुई तो घर आई। सोचा क अब खुद से खुद के लिए लिपस्टिक लाउबगि। बहुत रंग देखे कुछ पसंद नई आया। बहुत लिपस्टिक देखि 300 से लेकर 1100 wali और फिर सोचा के क्या करुँगी लिपस्टिक लेकर, मुझे कौनसा शोक है इन चीजो का। लेकिन लिपस्टिक की तमन्ना जा ही नहीं रही थी और फिर अपने घर के पास की दूकान से रेखा ने 2 लिपस्टिक ले ली।
वो लिपस्टिक ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी है । 10 दिन से वाही पड़ी है लेकिन पता नहीं क्यों उन्हें खोलने का भी दिल नई करता।

सोचती हु के वो इंसान जिसकी खुद की 2 बिया हो और वो उन बेटियो पर जान नियोछावर् करता हो, वो कैसे अपनी ही बेटियो की हर कसम भूल जाता है। वो कैसे किसी दूसरे की बेटी को इतनी आसानी से छल लेता है
राजीव बह



Thursday, 15 February 2018

Aur kitni zainab

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vo panch din maano hazaro saal the
har pal ha kisi ke pas naye sawaal the
par har sawal ka javaab bus la-javab tha
puchta tha har koi, har gali se  tera pataa 
par koi rasta mud kar javab na deta tha
us raat ammi ro ro kar duhai deti rahi
teri kanch ki churiyo ko je bahr dekhti rahi
vo gulabi rang tha tera manpasand
dekhkar teri kitabe dil par chata tha ranj
abba laaye the naya khilona albela
sochte the ke bus abhi aa jayegi tu
bhai kahta raha ke ab aogi to har baat manega teri
jis tofee choclate ke liye ladti thi se jee bhar ke dunga
ab lagne laga tha duayo ka rang bhi feeka
tum aai lekin saanse harkar aai
tum aai magar ansua ka sailaab lekar aai
tum aai magar ik inqulaab lekar aai
tum aai magar maa ka dil cheerkar aai
tum aai magar beharam duniya ka sar jhuka kar aai
tum aai zainab magar jaane ke liye  aai
khuda kare ke zainab ko insaaf mile
bus itna insaaf or yakeen mile
ke dubara koi zainab na bane ab




Friday, 26 January 2018

जब कर्फ्यू मै था एक शहर सिरसा

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सिरसा शहर मै कर्फ्यू लग गया।क्योंकि एक साधू एक संत की एक बलात्कार के मामले मैं फैसला आनेवाला था और फैसला का रुख उस संत के खिलाफ दिख रहा था।
उन दिनों एक माँ बिस्तर पर पड़ी हुई बीमारी की गंभीर हालात झेलती हुई दो बेटो के साथ उस अनजान शहर मे जी रही थी। अनजान शहर इसलिए क्योंकि उस शहर मई कोई उसे जाननेवाला नहीं था। वो उस शहर मई 7 8 महीने पहले ही अपन दो बेटो के साथ आई थी। दरसअल उसकी बेटी साथ के शहर मैं ब्याही हुई थी ।और उसने ही अपनी माँ और भाइयो को पहले अपने शहर सिरसा मै बुलाया फिर दोनों भाइयो का जैसे तैसे कुछ काम शुरू करवाकर सिरसा शहर मै किराये का घर दिलवाया।
अब दोनों भाई उस शहर मई अपनी माँ के साथ रहते थे।
इस कहानी मै, जो माँ का पात्र है वो वास्तविक जीवन मै मेरी बहुत नजदीकी रिश्तेदार हैं जो अभी पिछले बरस तक उत्तर प्रदेश के एक शहर मई अपने भरे पुरे ससुरालियों और मायके वालो के बीच रहा करती थी। इस बीच उनके पति को दो बार अधरंग का अटैक आ गया, एक बार कोहनी की, एक बार कंधे की हड्डी टूट गई और एक बार कूल्हे की हड्डी की ऑपरेशन , इस तरह धीरे धीरे दोनों बेटो ने अपनी जमा पूंजी और साथ ही पुश्तैनी जायदाद का अपने हिस्से का टुकड़ा बेचकर उनके इलाज पर लगा दिया। और ऊपर एक शादीशुदा बहन को हर त्यौहार पर कुछ न कुछ देने की रस्म के चलते काफी कर्जे मई दुब गया परिवार।
लेकिन आखिर मै होनी बलवान हुई और एक पिता  ने लंबी बीमारी से जूझते हुए दीवाली से 5 दिन पहले , 2016 मे अपने देह त्याग दी।
अब बस बची केवल माँ, लेकिन कहते है क माँ की छाया इस दुनिया की सबसे बड़ा आसरा और ताकात है । अब दोनों बेटे और माँ सिरसा शहर मै रहते है। लेकिन अचानक एक महीने से माँ की तबियत बहुत ख़राब रहने लग गई। अब माँ पिछले 20 दिन से बिस्तर पर है। उन्हें लगातार दवाई डॉक्टर की जरुरत पड़ती रहती है
लेकिन संत समुदाय के जाने माने संत और करोड़ो लोगो की श्रद्धा के प्रतिक , राम रहीम की कोर्ट मे पेशी होनी थी तो 3 दिन पहले ही शहर मे कर्फ्यू लग गया। अब ये बच्चे न तो काम पर जा प् रहे है और न ही माँ के लिए दवाई लेने जा सकते है क्योंकि पूरा शहर दंगो और आग मे झुलस रहा है।
और माँ बिस्तर पर लेती हुई बेजान से शारीर के साथ सोच रही हैके काश किसी तरह वो उठ जाए और अपने बच्चों को दो रोटी बनाकर दे दे।
पर क्या फरक पड़ता है किसी को एक बीमार इंसान के दर्द तकलीफ से। यदि दूसरे नजर से देखे तो इन श्रद्धालुओं और दंगाईयो मै कोई ख़ास फरक भी नहो, दोनों केवल खुद की झूठी आन बाण और जिद्द के लिए शांति प्यार सद्भाव सब खत्म कर रे है
लेकिन काश किसी को जरा सा भी ये कहानी छू जाए तो जान जाए के इंसानियत इस धरती पर सबसे बड़ा धर्म है और जीवन का वास्तविक लक्ष्य भी।



Ruchi Sehgal